मुख्य सामग्री पर जाएँ
गीता मैत्री अंक ७जनवरी से जून २०२४
०८आयोजन और अभियान

चरण पादुका सेवा

अहोभाग्यम्! सनातन संस्कृति के प्राण श्री रामलला अपने पावन धाम अयोध्यापुरी में 22 जनवरी 2024 को पुनः प्रतिष्ठित हो गये हैं।

चरण पादुका सेवा

अयोध्या धाम

22/02/24

जय श्री राम

केवल ऋषि, महर्षि , साधु, संत, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का, ब्रह्माण्ड का कण कण रामभक्ति से परिपूर्ण हो उठा और प्रत्येक राम भक्त के मुख से बस जय श्रीराम के नारे, चित्त में रामलला के दर्शन की अभिलाषा है। मानो कलयुग में ही त्रेतायुग अवतरित हो गया हो और हर कोई इस सुनहरे पल का साक्षी बनना चाहता हैं। इसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है।

"आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्, आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति, श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥2.29॥"

इस अवसर पर गीता परिवार को पादुका सेवा का सौभाग्य मिला। जो अपने आप में परम कल्याणकारी है। महाभारत काल में किये गये राजसूय यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं पादुका सेवा का कार्य स्वीकार किया और यह संदेश दिया था कि सेवा परम आदर्श है। यह दूसरों के प्रति वह सद्भाव है जो लोक कल्याण को साकार करता

है। भगवान कहते हैं मंदिर का चमकता हुआ स्वर्ण कलश जितना महत्वपूर्ण है उतना ही नींव का पत्थर

यानि आन्तरिक स्वच्छता।

गीता परिवार द्वारा लगभग 9000 आगंतुकों की पादुका सेवा का नियोजन मात्र 2 दिन

में किया जाना था, जो कि सरल कार्य नहीं था। परन्तु कार्यकर्ताओं के अदम्य उत्साह, गीता परिवार की अनुभवी दृष्टि और परम पूज्य स्वामीजी के आशीर्वाद द्वारा यह संभव हो पाया। प्रातः 9 बजे से रात्रि 2 बजे तक प्रतिदिन आदरणीय आशू भैयाजी के निर्देशन में सभी कार्यकर्ताओं द्वारा पूर्ण सुव्यवस्थित ढांचा खड़ा किया गया। इसमें 25000 से भी अधिक नट कसे गये। अतिथियों के पांव से स्वयं पादुका उतारने जमा करने से लेकर, सभी के हाथ सुगंधित जल से स्वच्छ करवाना, पादुकाओं की सफाई करना, सहेजना व वापस लौटने पर साधकों को अपने हाथों से पादुका पहनाने का काम गीता परिवार के सदस्यों द्वारा किया गया। इस कार्य में सभी सेवकों के बस भाव यही थे कि धन्य भाग्य हमारे। जैसा कि आशू भैयाजी

हमेशा कहते आए हैं कि हमारे पूर्व जन्म के फलस्वरूप ही ऐसा सौभाग्य प्राप्त होता है । माननीय अतिथियों के प्रशंसा भाव "आपकी पादुका सेवा सबसे सुव्यवस्थित व सराहनीय है", यह अपने आप में गीता परिवार की कार्यप्रणाली का परिचय देते है। सभी आये हुए महानुभावों को Learngeeta पत्रक वितरित कर गीता परिवार के कार्यक्रम की जानकारी भी दी गयी ।

सेवा कार्य से मन का अंहकार दूर होता है।

हम मनुष्यत्व की ओर अग्रसर होते हैं। इस मर्म को गीता परिवार ने समझा और कलयुग में रामलला की प्रतिष्ठा से बढ़कर राजसूय यज्ञ क्या होगा! भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय पादुका सेवा में अपने प्रिय गीता परिवार एवं श्रीदुर्गाजी मंदिर समिति के गीताभक्तों को इस सेवा का अवसर प्रदान किया।

मूल अंक के पृष्ठ देखें ३ पृष्ठ
मूल अंक, पृष्ठ ४८मूल अंक, पृष्ठ ४९मूल अंक, पृष्ठ ५०