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गीता मैत्री अंक ७जनवरी से जून २०२४
गीता भक्ति महोत्सव
०९गीता भक्ति अमृत महोत्सव

गीता भक्ति महोत्सव

प. पू स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी महाराज के 75वें जन्मोत्सव के गरिमामय अवसर पर पुणे के पावन तीर्थस्थल आलंदी में 'गीताभक्ति अमृत महोत्सव' का आयोजन किया गया। इस अष्टदिवसीय महोत्सव में देशभर के प्रसिद्ध संत और गणमान्य व्यक्तित्व उपस्थित रहें।

आलन्दी 4 - 11 फरवरी 2024

इस भव्य के आयोजन के अवसर पर 15 हजार लोगों की आस्था का संगम हुआ। इस महोत्सव में हवन-पूजन, कीर्तन और श्रीमद्भागवत कथा की विशाल व्यवस्था की गयी। धार्मिक श्रद्धालुओं और श्रोताओं हेतु इस विशेष अवसर पर टेंट में 70 हजार स्क्वायर फीट के भोजन की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही अतिविशिष्ट लोगों के लिए उचित पार्किंग की व्यवस्था भी की गई।

इस महोत्सव में राजनीति, अध्यात्म और सामाजिक क्षेत्र के विख्यात जन उपस्थित हुये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मा. मोहनराव भागवत जी, योग गुरु स्वामी रामदेव जी महाराज, साध्वी ऋतंभरा जी और आचार्य बालकृष्ण जी जैसे प्रमुख व्यक्तित्व महोत्सव में शामिल हुए। वेदपाठी आचार्यों द्वारा 81 हवन कुंडों से लगातार यज्ञ-हवन भी हुआ जो कि इस उत्सव का एक अत्यन्त मुख्य अंग रहा। इसके साथ ही 6 हजार लोगों ने हरि पाठ किया।

इस महोत्सव में देश के उत्कृष्ट संतों और मनीषियों का मार्गदर्शन मिला और जनमानस को नई दिशा मिली। इस कार्यक्रम में सभी ने खूब आनन्द प्राप्त किया।

परमार्थ में गुरु द्वारा मन्त्रोपदेश व गुरुप्रसाद की प्राप्ति दोनों ही अति महत्वपूर्ण माने जाते हैं। स्वामी श्री गोविन्ददेव देव गिरिजी महाराज ने वेद विद्यालयों व गीता संथा वर्ग की स्थापना कर हम सभी को कृतार्थ किया है। गीतोपदेश व मन्त्रोपदेश इसका अर्थ है विद्यादान व शक्तिदान संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज अपने एक अभंग में कहते हैं-

कृपा कटाक्षे न्याहाळिले, आपल्या पदी बसविले।
बाप रखुमादेविवरू विठ्ठले , भक्तादिधले वरदान॥

अर्थात् गुरु की कृपा यह भक्त के लिए वरदान होती है। हितोपदेश व मन्त्रोपदेश यह एक प्रकार का शक्तिदान है। श्रद्धेय स्वामीजी ने पचहत्तर संतों का सम्मान सम्पूर्ण अमृत महोत्सव के निमित्त करने का संकल्प किया। विद्वानों के सम्मान द्वारा कृतज्ञता ज्ञापन पर्व का आरंभ हुआ।

ज्ञानीजनों की साधना, अभ्यास व वैराग्य से सफल होती है, ये संत महात्मा स्थितप्रज्ञ होते हैं। सभी संतों के साथ स्वामीजी का स्नेह बंधन अटूट है। गीताजी में स्थितप्रज्ञ पुरुषों के लक्षण सर्वत्र उल्लेखित हैं।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥2.54॥

तृतीय दिवसीय कृतज्ञता ज्ञापन पर्व पर सभी संतों का आशीर्वाद सर्व उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों को प्राप्त हुआ, संतों के महासंगम से तीर्थक्षेत्र आलंदी कुंभ सदृश हो गया।

पूज्य स्वामीजी ने सर्व प्रथम लोकेश मुनिजी व गीता महर्षि श्रीज्ञानानन्दजी का स्वागत किया तत्पश्चात् श्री ज्ञानानन्दजी स्वामी महाराज व योगेश मुनिजी की उपस्थिति मे स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी महराज ने केरल के राज्यपाल महामहिम श्री आरिफ मोहम्मद खानजी का स्वागत शॅाल व स्मृति चिह्न देकर किया।

ज्ञानी संत सम्मान मूर्तियों का सम्मान

-स्वामीजी व केरल के महामहिम राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खानजी के शुभ करकमलों द्वारा शॉल व भगवान राम की मूर्ति के स्मृतिचिह्न द्वारा संतों का सत्कार किया गया।

1. सम्मान के प्रथम पायदान पर पंडित श्री उल्लासजी कशाळकर आये, जिनके गान व गायकी से चैतन्य व उल्लास जाग्रत होता है। आपकी संगीत साधना बेजोड है। आपमें जयपुर, ग्वालियर व आगरा तीनों घरानों का त्रिवेणी संगम है। श्री कशाळकरजी के द्वारा कई सक्षम विद्यार्थी तैयार किये गये हैं।

2. सर्व रागों में कठिन द्रुपद राग की गायकी को प्रसारित करने वाले शास्त्रीय संगीत के सुविख्यात पंडित श्रीउदयजी भवाळकर का सम्मान उभय वृंद श्री स्वामीजी व राज्यपालजी द्वारा किया गया। गौरवोद्गार में स्वामीजी ने कहा नामशेष होते द्रुपद राग को श्री भवाळकरजी ने नव संजीवनी प्रदान की।

3. महाराष्ट्र में चलने वाली गणेश साधना के शास्त्रीय लेखनकार गानपत्य पंडित श्री स्वानन्दजी पुंड जो उत्तम लेखक, प्रवचनकार, वक्ता, व्याख्याता व शिक्षक भी हैं, उनकी लिखित ग्रंथावली का उल्लेख कर उनकी विद्वत्ता को गौरान्वित किया।

4. इन त्रिमूर्तियों का स्वागत सत्कार कर आगे के सूत्र संचालन के लिए गिरीश भैया पधारे व उन्होंने गीता परिवार के अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष श्री आशूजी गोयल को प्रास्ताविक वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया।

डॉ. आशूजी गोयल का प्रास्ताविक वक्तव्य

दिनांक 4 फरवरी से स्वामीजी के जन्म का अमृत महोत्सव प्रारंभ हुआ। सारे शिष्यवृंदों की लालसा थी की श्रद्धेय स्वामीजी का जन्मोत्सव एक अमिट व अविस्मरणीय क्षण बन जाए, किंतु जिनके मन में न कोई लोभ हो न कोई कामना ऐसे स्वामीजी ने यह निवेदन सुनकर इतना बड़ा उत्सव न करना चाहा ,वे सिर्फ आलंदी तीर्थक्षेत्र में भागवत सप्ताह करना चाहते थे, बस सारे शिष्यों ने आलंदी तीर्थ क्षेत्र पर संत संगम आयोजित किया। संत वृंदों का आलंदी में आगमन हुआ, केरल के राज्यपाल महामहिम आरिफ मोहम्मद खान जी भी आमंत्रण स्वीकार कर आये व कुंभ मेले जैसा संत मेला छा गया। जैन पद्धति का अनुगमन कर साधनारत लोकेश मुनिजी भी पधारे। आदरणीय मारूती महाराज का वंदन व पूजन स्वयं स्वामीजी ने किया, स्वामीजी ने कहा "यह जन्मोत्सव मेरा नहीं सारे जन जन का है , जिन्होंने अपना सारा जीवन साधना में समर्पित किया ऐसे कर्म योगियों का सत्कार होना चाहिए।" आशू भैया ने प्रस्तावना का आरंभ प्रार्थना व गुरु चरणों के वंदन से किया। आ. आशू जी ने अपनी रामायणी शैली से वक्तव्य आरंभ किया...

शुभचिन्ह शोभे, मुनिमन लोभे,
सरसिज फूले, अलिरस घोले।
दुर्लभ संतन के मिलन से साजे,
आलंदी सबके मन लागे॥

मंच पर उपस्थित सभी मुनिवृंदों को प्रणिपात, राज्यपाल जी को वंदन, स्वामीजी को दंडवत प्रणाम कर आ.आशू भैया बोले “माऊली की कृपा से स्वामीजी ने गीता भक्ति महोत्सव के रूप में अमृत महोत्सव मनाने की स्वीकृति दी। लाखों लोगों में भारतीय सनातन पद्धति के प्रति पूर्ण श्रद्धा जाग्रति के उद्देश्य को समक्ष रख माऊली की धरती पर व संत श्री तुकाराम महाराज के गुरुकुल वेदश्री तपोवन के मध्य धर्मरक्षा हेतु समर्पित, मंचों व प्रसिद्धि से दूर रहने वाले पचहत्तर विद्वानों का सत्कार कर कृतज्ञता ज्ञापन करने की व आलंदी में श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन की स्वीकृति पाकर सारे इस आयोजन की सफलता में जुड़ गये। दुर्लभ 81 कुण्डीय यज्ञ का आयोजन स्वामीजी की वैदिक पाठशाला के 2500 वैदिक आचार्यों के द्वारा किया गया। पांच सौ से अधिक लोगों की भूमिका से सुशोभित नाटक “यह पुण्यप्रभाव हमारा भी किया गया।

इन्द्रायणी के तट पर दस हजार साधकों द्वारा तेरह भाषाओं में गीताजी सीखने वाले साधकों द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण किया गया। आलंदी की पवित्र भूमि और भी पावन हो गयी।

पचास हजार अपेक्षित उपस्थिति से कहीं अधिक लोग जन्मोत्सव निमित्त आलंदी आये। संतो का यह अभूतपूर्व संगम, भगवान से परम भक्ति का स्पंदन अनुभव करा गया।

“जय ज्ञानेश्वर माऊली, जय आलंदी” का जय घोष सारा आसमंत व्याप्त कर गया।

वामांगी जानकी, भ्राता लक्ष्मण व मध्य में राम की त्रिमूर्ति स्मृति चिह्न के स्वरूप भेंट में देकर सारे संतवृंदों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

वैराग्य से आनन्द प्राप्ति होती है व मोह से दुःख मिलता है, यह स्पष्ट हो गया। धर्म से पूर्ण संतों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा द्विगुणित कर दी। जन्मोत्सव तो निमित्त मात्र था। वास्तव में इस गीता भक्ति अमृत महोत्सव का आयोजन लाखों लोगों के मन में वेदों व सनातन संस्कृति के प्रति आस्था जाग्रत करने का था।

सभी संत व महापुरुष विभूषित करने वाले उपनामों या भेट वस्तुओं के लोभ से परे मोह से दूर मानव व्यवहार में धर्म की स्थापना करने की लालसा से आलंदी तीर्थक्षेत्र में दूध का दूध व पानी का पानी करने की क्षमता रखने वाले हंसों की तरह एकत्रित हुए थे।

तीनों सत्कार मूर्तियों का करतल ध्वनि से स्वागत कर सूत्र संचालन का भार श्री गिरीश भैया को सौंपा गया। भैयाजी ने स्वामीजीसे मार्गदर्शक मनोगत प्रस्तुत करने की विनती की।

प. पू. स्वामीजी का उद्बोधन

श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी महाराज ने रामचरित मानस के बालकांड का प्रथम श्लोक मंगलाचरण से अपने वक्तव्य का प्रारंभ किया।

स्वामीजी ने कहा “षट्तिला एकादशी के इस पावन पर्व पर आज प्रातःकाल से मैं प्रतिक्षण व्यस्त हूं, लोगों की शुभकामनायें, छोटों की शुभेच्छायें, बड़ों के आशीर्वाद स्वीकार कर रहा हूँ”।

जन्मदिन मनाने का मुझे शौक नहीं, इस देह के लिए कोई उत्सव करने में मुझे रस नहीं है, परंतु सम्पूर्ण संसार के 181 देशों से भाईचारे व समरसता की विचारधारा से एकत्रित हो सारे शिष्यवृंद निर्वाह कर सकते है। मित्रों के इस आश्वासन के कारण मुझे स्वीकृति देनी पड़ी।

मेरी इच्छा थी सारे संसार की समन्वय भूमि है आलंदी। सारे उदात्त विचार महाराज ज्ञानेश्वर से प्राप्त हुए हैं, मेरी श्रद्धा का केन्द्र है आलंदी, तो गीताभक्ति अमृत महोत्सव आलंदी में मनाया जाये।

संसार में जितने भी आध्यात्मिक स्थान हैं, उन सबसे सर्वाधिक ऊर्जा का स्थान है आलंदी। मित्रों के इस आश्वासन से कि हम भारतीय समस्त विचारों का निष्कर्ष श्रीमद्भागवत की कथा आलंदी में सुनायेंगे तथा ७५ ऐसे लोगों का सम्मान किया जायेगा जिनका सम्पूर्ण जीवन समाज, राष्ट्र, संस्कृति व मानवता की सेवा में लगा है, तो मैं तैयार हो गया।

देवद्विज गुरुप्राज्ञ पूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥17.14॥

मेरा ध्येय वाक्य "गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें" इस मार्ग पर चलते चलते बहुत आह्लाद होता है जब यह ध्यान आता है कि तीन वर्षों मे गीता परिवार के भाई बहिनों ने ऐसा चमत्कार किया है कि 180 देशों से छह वर्ष से उन्यासी वर्ष की आयु तक के साधक तेरह भाषाओं में, उन्नीस (19) समय सत्रों में गीता पढ़ रहे हैं। हमारा सारा जीवन गीता के लिए समर्पित हो जाना चाहिए। यह गीता भक्ति दिवस है। गीता भक्ति जीवन मूल्यात्मिका भक्ति है। “जीवन मूल्यों व सद्गुणों का विकास ही भगवद्भक्ति है”। तत्पश्चात् श्रद्धेय स्वामीजी ने केरल के राज्यपाल महामहिम श्री आरिफ मोहम्मद खानजी की शान में कुछ शब्द कहे। व्यक्ति को कैसे बनना चाहिए तो केरल के राज्यपाल आरिफजी के जैसे।

आरिफजी समन्वय के मार्ग पर बढ़ने वाले महापुरुष हैं। आपकी वाणी का प्रसार सर्वत्र हो, इसे अमानित्व कहते हैं। आपकी गुण सम्पदा का हम अभिवादन करते हैं। आपकी वाणी का लाभ आलंदी में उपस्थित समस्त साधकों व देश विदेश के कार्यकर्ताओं को प्राप्त हो।

राज्यपाल महामहिम आरिफजी का वक्तव्य

सर्वप्रथम महामहिम जी ने संत ज्ञानेश्वर महाराज व राष्ट्रसंत तुकाराम महाराज की पुण्यभूमि में उपस्थित सर्व भक्तगण जो ज्ञानयज्ञ के महत्वपूर्ण घटक थे, उनका अभिवादन किया। तत्पश्चात् श्रद्धेय स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी महाराज, गीता मनीषी श्री ज्ञानानन्दजी महाराज, श्री लोकेश मुनिजी महाराज, पूज्य स्वामी विश्वेश्वरानन्दजी महाराज, मारुती कुर्हेकर महाराज, सभी संतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। स्वामीजी के जन्मोत्सव का यह अनूठा आयोजन करने वाले सभी आयोजकों को उन्होंने साधुवाद कहकर प्रशंसा की। महामहिम बोले “यह उत्सव ज्ञान का, भक्ति का, राष्ट्रीय शक्ति जागरण का उत्सव है। भारतीय संस्कृति व्यक्ति की, समाज की, राष्ट्र की शक्ति मानव कल्याण के लिए समर्पित करने की प्रेरणा देने वाली है, यह उस संस्कृति का उत्सव है। आज इस मंच पर व यज्ञ कुण्ड के पास ज्ञानीसंत विराजमान हैं।

'जो मुझे सबके अन्दर देखता है और सभी को मेरे अन्दर देखे, वह न तो मुझसे अलग होता है और न मैं उससे अलग होता हूँ।'

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥13.27॥

जो विनाश होने वाले तत्त्व के अन्दर अविनाशी तत्त्व देखे वही देखने वाला है, नेत्रों वाला है। रामजी की मूर्ति स्मृतिचिह्न के रूप मे देना प्रासंगिक युक्तिसंगत है। यहां एक वनगमन का प्रसंग श्री आरिफजी ने सुनाया।

रामजी ने वनगमन का निर्णय लिया, राजतिलक की जगह वनवास की तैयारी की शुरुवात हुई, राजसी पोषाक त्यागकर वनवासी पेहराव हुआ। लक्ष्मणजी ने बहुत क्रोधित होकर पिता के लिए अपशब्द कहे। श्रीरामजी सुनते रहे और जब लक्ष्मणजी का क्रोध थोड़ा शांत हुआ। तब वे बोले कि हमारा आचरण हमारी सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार हो, लक्ष्मण तुम नाराज हो कि चौदह वर्ष वन में त्रासदी झेलनी पड़ेगी, यह त्रासदी शरीर की है एवं तुम शरीर नहीं आत्मा हो जो कभी मरती नहीं है और न ही पैदा होती है। ये दो लाईनें हमारी सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए प्रासंगिक हैं।

महामहिम जी ने आदि शंकराचार्यजी के निम्नलिखित श्लोक के साथ अपना वक्तव्य समाप्त किया।

न मे द्वेषरागो न मे लोभमोहो,
मदो नैवं मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्द रुपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥

न मैं बुद्धी हूँ, न मैं द्वेष, न राग, न लोभ, न क्रोध हूं, मैं कुछ भी नहीं, मैं तो चिदानन्द हूँ। यह हमारी संस्कृति है। आज जब चारों ओर तनाव व अशांति नजर आती है, हम यह विश्व को दिखा दें कि हमारी संस्कृति किसी को दबाने के लिए नहीं वरन् मानव कल्याण के लिए समर्पित है।

लोका: समस्ता सुखिनो भवन्तु।

हिन्द की जय के साथ वक्तव्य समाप्त हुआ। गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण व्यासजी ने आभार प्रदर्शन का कार्य सम्पन्न किया।

राष्ट्र गीत के साथ इस कार्यक्रम का समापन हुआ। इसीप्रकार अनेक वैदिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों के माध्यम से सभी को भारतीय संस्कृति की अमूल्य विरासत का अनुभव हुआ।

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