
सन्त वाणी
आज सप्तम संस्करण के प्रस्तुतिकरण पर मैं अत्यंत आह्लादित हूँ। गीता परिवार के इस पुण्य कार्य को हम सेवा के रूप में श्रीकृष्ण भगवान के प्रिय होने हेतु कर रहे हैं। यह साधना है, अनेक सेवाभावी काल की चुनौती स्वीकार कर इस सेवा मे रत हैं। देश बदल रहा है, वातावरण बदल रहा है, लोग गीताजी पढ़ने के लिए लालायित हैं, चक्र घूम रहा है, इस गीता शब्द राशि का संरक्षण होना चाहिये। जिस गीता को हम वैदिकों से सुनते आ रहे हैं वह गीता प्रशिक्षण में आ गयी तो राष्ट्र का उत्थान होगा। शिवाजी महाराज कहते थे, 'राज्य व्हावे ही तर श्रींची इच्छा' उसी प्रकार यह राष्ट्र ईश्वर इच्छा से प्रबल होने वाला है। गीता परिवार का राष्ट्रोत्थान में सूक्ष्म अंश होगा, यह मेरा आशीर्वाद है।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥11.33॥
अर्जुन को भगवान ने जिस प्रकार से धर्म की स्थापना हेतु उत्साहित किया, उसी प्रकार अमृतकाल का शुभारम्भ हो रहा है। चारों ओर नयी जागृति दिखाई दे रही है। सभी कार्यकर्ता कम से कम एक घंटा नियमित कार्य कर रहे हैं। हमारे कार्यकर्ताओं ने ये श्लोक अपने सामने रखा- "य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति" - हम यह जो कार्य कर रहे हैं, भगवान की सेवा के रूप में कर रहे हैं। स्वयं गीता का अध्ययन करना, औरों को गीता पढ़ाना और गीता को अपने जीवन में लाने का प्रामाणिक प्रयास करना यह साधना श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्रीकृष्ण की दृष्टि से सर्वोच्च साधना है। भगवान को प्रिय होने का इससे उपयोगी और सरल कोई मार्ग नहीं ऐसा स्वयं भगवान कहते हैं।
चार वर्ष पूर्व 23 जून 2020 को स्थापित लर्नगीता रूपी घुटनों पर रेंगने वाला शिशु अब मैराथन रेस में सहभागी होने जा रहा है। इस महत्कार्य का श्रेय राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष व अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष के कुशल नेतृत्व को प्रदान कर मैं अपना आचमन श्रीकृष्ण भगवान को अर्पित करता हूँ।
