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गीता मैत्री अंक ७जनवरी से जून २०२४
१३मार्गदर्शन

ऐसी वाणी बोलिये

भगवान की अतिशय मङ्गलकृपा से हम सबका ऐसा सद्भाग्य जाग्रत हुआ कि हम लोग अपने जीवन में श्रीमद्भगवद्गीता सीखने के साथ, इस महत् कार्य में गीतासेवी बनकर प्रवृत्त हो गये हैं। हममें यह आकॉंक्षा जगी कि हम अपने व्यक्तित्व को सतत निखारते चले जाएं।

नीति प्रबन्धन व स्वभाव (NPS)

शनिवार 21 जून 2024

श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः

आज योग-दिवस की सन्ध्या पर आप सभी को इस बात की बधाई कि हम अपने जीवनकाल में यशस्वी प्रधानमन्त्री जी की सद्चेष्टा और सद्प्रयास से दशम् अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस मना रहे हैं। पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज का एक प्रवचन है -

“गीता ही सम्पूर्ण योग है।”

अभी योगासन वाला योग प्रचलन में है। योगासन वाला योग तो अष्टाङ्गयोग का एक भाग है। अष्टाङ्गयोग सैकड़ों योगों में से एक छोटा सा योग है। योग का विचार करते समय प्राणायाम और आसन को पूर्ण योग मान लेना ठीक नहीं होगा। महर्षि पतञ्जलि के अष्टाङ्गयोग के आठ सोपान हैं।

1-यम 2-नियम 3-आसन 4-प्राणायाम 5-प्रत्याहार
6-धारणा 7-ध्यान 8-समाधि

इस अष्टाङ्गयोग में तृतीय और चतुर्थ सोपान हैं - प्राणायाम और आसन।

आजकल प्राणायाम और आसन को ही योग कहने लगे हैं। श्रीमद्भगवद्गीता पठन करने वालों को ज्ञात होना चाहिए कि योग केवल योगासन तक ही सीमित नहीं है। योग का अर्थ है परमेश्वर से जुड़कर अपने मौलिक स्वरूप को प्राप्त करना। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने योग के विषय में बहुत कुछ कहा है।

“योग: कर्मसुकौशल:”

कर्मों में कुशलता ही योग है।

आज योग की इसी सूक्ति पर श्रीमद्भगवद्गीता के दृष्टिकोण से विचार मन्थन करते हैं। गत सत्रों में अनेक विषयों पर विचार हुआ। कार्यकर्ताओं को दो क्षमताओं की अधिक आवश्यकता रहती है -

तकनीकी ज्ञान तथा उत्तम वाणी।

इसी के दृष्टिगत आज का सत्र वाणी की विशेषता पर आयोजित किया गया है। कोई भी कर्म तीन प्रकार से सम्पन्न होता है -

मनसा वाचा कर्मणा

मन, वचन और कर्म में एकरूपता हो। हमारे मन की कुशलता, हमारी वाणी की कुशलता और हमारी कामेन्द्रियों की कुशलता के अनुसार ही, हमारे द्वारा निष्पादन किये गये कार्य की कुशलता निर्भर करती है। कुछ लोगों के मन के विचार, वाणी की अभिव्यक्ति और कर्मेंद्रियों की गतिविधियों में भिन्नता होती है। तीनों में तालमेल नहीं होता, ऐसे दम्भी या भिन्न प्रकृति वालों के विषय में यहॉं विचार करने की आवश्यकता नहीं है। किसी के दुर्गुणों पर विचार नहीं करना है। यहॉं सभी गीता सेवी हैं, जो भगवान के सीधे सादे भक्त हैं। यहाँ सबके मन कर्म और वचन में एकरूपता है। मन में कुछ गड़बड़ी हो तो प्रयास करने पर भी रोक नहीं पाते। भीतर की गड़बड़ी वाणी में आ जाती है, और वाणी से कर्म में भी आ जाती है। घटित होने के बाद पश्चाताप भी करते हैं।

दम्भ करना भी सदैव सम्भव नहीं होता। शूर्पणखा सुन्दर वेशभूषा धारण करके श्रीराम के पास गयी, वाणी भी मधुर थी।

तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारि।
यह संजोग बिधि रचा बिचारि॥
-अरण्यकाण्ड

शूर्पणखा का बड़ा सुन्दर आचरण दृष्टिगोचर होता है। किन्तु दो-तीन बार श्रीराम जी ने इधर-उधर दौड़ाया, उसका सौम्य रूप पुनः दम्भ में आ गया! पुनः राक्षसी वेश में आ गयी।

Cannot carry it long.

उसी शूर्पणखा का भाई रावण श्रीसीता जी का हरण करने आया तो साधू का वेश धारण करके बताया बोला -

भिक्षाम् देहि!

भीतर से तो वह राक्षस ही है। साधु का आचरण

अधिक समय धारण नहीं कर पाया। सीताजी को कन्धे पर उठाया और चल दिया। इसलिए हमारे महापुरुष और नीतिज्ञ कहते हैं, कि एक ही भेंट में किसी पर विश्वास नहीं करें, धोखा हो सकता है। वह दम्भी हो सकता है! यदि अधिक बार किसी से मिलकर जानेंगे तो धोखा होने की आशङ्का नहीं रहती। कम समय में किसी पर विश्वास कर लेने से धोखा खाने की सम्भावना रहती है।

सत्रहवें अध्याय में श्रीभगवान ने मन से, वाणी से, शरीर से तीनों तप अलग-अलग करके बताए हैं-

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥17:16॥

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥17:15॥

देवद्विजगुरुप्राज्ञ पूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा शारीरं तप उच्यते॥17:14॥

इन तीनों तपों का पृथक-पृथक महत्व है। आज दशम् अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर वाणी के तप की महत्ता विचार कर रहे हैं। यह सब चिन्तन हम स्वयं के विषय में करें, अन्यों पर प्रक्षेपण हेतु नहीं। अन्य का परीक्षण करने की अपेक्षा हम स्वयं का परीक्षण करें।

Assessment of SELF not of Others!
तुका करे मन का संवाद, अपनी बात अपने से!

एक बार शरीर के अङ्गों में वाद-विवाद हो गया। सभी आत्म-प्रवञ्चना करने लगे।

हाथ बोले - सभी कार्यों का सम्पादन हम ही करते हैं।

पैरों ने टोका - कार्यस्थल तक हम न पहुॅंचाएं, तो कार्य निष्पादन नहीं कर पाओगे।

ऑंखों ने ऑंखे तरेरी - उस कार्य की प्रकृति तो हम ही देखती हैं, अन्यथा न तो वहॉं पहुॅंच पाएं और न ही काम कर पाएं!

कानों ने भी हेकड़ी भरी - कार्य और कार्यस्थल की विषयवस्तु का ज्ञान तो हम ही सुन पाते हैं!

जिह्वा भी लपलपाई - इन सभी आकलनों का वर्णन तो मैं ही कर पाती हूँ, आप किसी में यह क्षमता नहीं है।

सबने जिह्वा को धमकाया - तुम तो रहने दो। तुम तो दाँतों में जकड़ी हुई और अस्थि-विहीन हो। तुम्हारी न तो शक्ति है, न ही प्रभाव। जीभ ने उत्तर दिया तुम सब किसी पर कुछ भी प्रहार करो या अपना सङ्केत करो, उसका प्रभाव कुछ ही काल पश्चात घटने लगता है। मैं अपनी वाणी से किसी को घायल कर दूँ तो उसका घाव चिरकाल तक स्थाई स्थापित हो जाता है।

शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव॥

जिह्वा कहती है, तुम सब तो केवल हानि पहुॅंचा सकते हो, वाणी औषधि भी है, वाणी घाव भी कर सकती है।

प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उनकी वाणी अच्छी हो, सब उसका कहा स्वीकार करें।

विश्वप्रसिद्ध उक्ति है-

विवाद के तीन कारण होते हैं -

जर, जोरू, जमीन।

किसी ने इसका प्रतिवाद किया कि अधिकांशतः ऐसा ही होता है, किन्तु सदैव ऐसा नहीं होता। सास-बहू के विवाद, पति-पत्नी के विवाद, स्वामी-सेवक का विवाद, मित्रों के विवाद, पड़ोसियों के विवाद इन सबकी सङ्गणना करने पर, छत्तीस में से तीन विवाद लोभ के कारण होते हैं। पॉंच विवाद अकारण हो जाते हैं। तीन विवाद कार्यप्रणाली के कारण होते हैं। पॉंच विवाद अन्य कारणों से होते हैं। बीस विवाद केवल जिह्वा की वाणी के कारण से होते हैं।

Someone talks, which is not acceptable!

हम जुलाई महीने में एक प्रयोग कर सकते हैं। प्रतिदिन विवाद और उसका कारण लिखते चलें। पूरे महीने की गणना करने पर, हम पाएंगे कि अधिकांश विवादों का कारण अनियन्त्रित वाणी है। या तो हमने किसी को गलत बोला या किसी ने हमें गलत बोला।

एक बार दो व्यक्तियों में झगड़ा हो रहा था। एक ने क्रोध से कहा - मैं तुम्हारे चौंसठ दाँत तोड़ दूँगा। पास खड़े एक व्यक्ति ने कहा - भाई साहब दाँत चौंसठ नहीं बत्तीस होते हैं। धमकाने वाले ने कहा मुझे मालूम था, तुम बीच में बोलोगे। इसलिए तुम्हारे मिलाकर चौंसठ तोड़ूँगा।

कुछ लोग बीच में अनावश्यक बोलकर झगड़े का कारण बन जाते हैं। अनेक बार दो आमने-सामने होने वाले व्यक्तियों में झगड़ा नहीं होता, जैसे ही तीसरा बीच में आता है, झगड़ा होने लगता है।

हस्तक्षेप करने से झगड़ा क्यों होता है? हम इसका चिन्तन करें।

वाणी के दो भाग हैं -

  • 1 अन्तःकरण- भीतर का छुपा हुआ।
  • 2 बहिर्करण- बाहर का जो प्रकट रूप में है।

किसी को बन्दूक की गोली लगी और वह मर गया, हम कहते हैं कि गोली लगने से मर गया। वही गोली बिना बन्दूक के मारें तो मृत्यु नहीं होगी। गोली की तुलना में बन्दूक अधिक मूल्यवान है। शक्ति ने जिस वस्तु को चलाया, वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, जिस शक्ति से सञ्चालन होता है, वह शक्ति अधिक बलशाली और महत्वपूर्ण होती है।

हमने किसी को अनुचित कुछ बोल दिया, यह बन्दूक की गोली के समान है। इस गोली को चलाने वाली बन्दूक की शक्ति कौनसी है? यह महत्वपूर्ण है। भगवान ने सत्रहवें अध्याय के तृतीय श्लोक में कहा -

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥17:3॥

मनुष्य विचारशील प्राणी है। जैसे उसके विचार हैं, वह वैसा ही होगा। यदि वह सतोगुणी है तो उसकी प्रेरणा सतोगुणी होगी। रजोगुणी है तो उसकी प्रेरणा रजोगुणी होगी। यदि वह तमोगुणी है तो उसकी

प्रेरणा भी तमोगुणी ही होगी। सतोगुणी की वाणी भी सौम्य, शान्त, शालीन और सुमधुर होगी। रजोगुणी व्यक्ति अहं से युक्त अत्यधिक वाचाल और तीव्रतम होगा। तमोगुणी अपशब्द और अवॉंछित कुतर्क का आश्रय लेता है। भगवान ने कहा है, जैसा जिसका स्वरूप है, उसका वैसा ही आचरण है।

चार प्रकार की वाणी

मध्यमा - ओष्ठों से बोली जाने वाली वाणी। तीव्रता से उच्चारित की जाती है।

वैखरी - कण्ठ से बोली जाने वाली वाणी। इस वाणी का वक्ता कुछ विचारशील होता है।

पश्यन्ति - हृदय से बोली जाने वाली वाणी। हृदय से बोलने वाला व्यक्ति अत्यधिक मननशील होता है।

परा - योगीजन द्वारा बोली जाने वाली वाणी। इसकी तो हम जैसे सामान्य मनुष्य के लिए चर्चा करना भी सम्भव नहीं है।

भौतिक रूप से जिह्वा की जॉंच करके कोई डाक्टर वाणी के अव्यक्त स्वरूप का पता नहीं लगा सकता। वह तो केवल प्रकट लक्षणों की ही जॉंच बता सकता है।

अन्तःकरण

अपने व्यक्तित्व, अपने अहं,
अपने स्वरूप को बदलना होगा।

चौथे अध्याय में श्रीभगवान ने कहा रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण की वृद्धि होती है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। 14:10

रजोगुण को शान्त करके, तमोगुण को दमन करके सतोगुण की वृद्धि करनी चाहिए।

अहं से मुक्त रहना है।

पहली आन्तरिक शक्ति है - मैं!

अहं अर्थात् मैं, वयं हम दोनों, हम सब। मैं जैसा हूँ, वैसा ही प्रकटीकरण मेरे शब्दों में होता है।

दूसरी आन्तरिक शक्ति है - चित्त!

जब हम किसी से बात करते हैं, तब चित्त के भण्डारण में जमा इतिहास प्रकट होता है। प्रिय व्यक्ति से प्रेम पूर्वक बोलते हैं। अप्रिय व्यक्ति होने पर वाणी का स्वर बदल जाता है।

यदि किसी कारण से चित्त की अवस्था ठीक नहीं है, झगड़ा किसी और से हुआ हो, उसका वाणी पर प्रभाव सभी जगह आ जाता है। कभी-कभी कार्यस्थल पर कहते हैं कि लगता है कि आज पत्नी से झगड़ा करके आया है। चित्त की विक्षिप्तता से बाहरी वातावरण बोली के कारण खराब हो जाता है।

तीसरी आन्तरिक शक्ति है बुद्धि!

भगवान ने बारहवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में कहा है-

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥12.14॥

हम जब मिलते हैं तो अच्छे से बात करते हैं। बुद्धि अपने चित्त की वृत्तियों को नियन्त्रित कर लेती है और

उसके कारण हम अनेक प्रकार की हानियों से भी बच जाते हैं। जिनका अपनी बुद्धि पर नियन्त्रण नहीं होता है, वे अच्छे सम्बन्धों को भी उल्टी बात बोल कर खराब कर देते हैं। कभी अज्ञानता से, कभी लापरवाही से तो कभी मूर्खता से, कभी उपहास उड़ाने के लिए तो कभी अपने अहम के कारण उल्टी बात बोलते हैं। मुख से क्या शब्द निकले इस पर बुद्धि का नियन्त्रण होना, यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।

भागवत का एक प्रसङ्ग है भगवान श्रीकृष्ण जी के पोते अनिरुद्ध के विवाह का प्रसङ्ग है। विवाह में सभी आए हुए थे। भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी हैं रुक्मिणी और रुक्मिणी के भाई हैं रुक्मी। भगवान जब रुक्मिणी जी का अपहरण करके निकल गए तब बलराम ने रुक्मी से युद्ध किया था। बलराम जी ने रुक्मी को हरा दिया था। तबसे रुक्मी और बलराम जी की अनबन है। बलराम जी और युधिष्ठिर जी को चौसर खेलने का बहुत शौक था और चौसर खेलना उतना आता नहीं था। रुक्मी को ज्ञात था कि बलराम जी को चौसर का व्यसन है। रुक्मी ने बलराम जी को कहा कि आओ चौसर खेलें, कृष्ण जी को भी बुलाया गया किन्तु कृष्ण जी ने मना कर दिया। अब रुक्मी और बलराम जी चौसर खेलने बैठ गए। उन दोनों के चित्त में पूर्व की बातें भी चल रही हैं। पहला, दूसरा, तीसरा दाव रुक्मी जीत गया। पहले उसने दस हजार दाव पर लगाए, फिर एक लाख और फिर दस लाख दाव पर लगाए। रुक्मी अपने पक्ष के राजाओं को अपने साथ लेकर बैठा। जो बलराम जी के हारने पर उन्हें हँस हँस कर चिढ़ा रहे थे। बलराम जी को बुरा लगा। उन्होंने गुस्से में आकर सीधे ही एक करोड़ मुद्राओं का दाव लगा दिया और जीत गए। इस पर रुक्मी बेईमानी करने लगा। बलराम जी ने कहा कोई बात नहीं इस बार दस करोड़ मुद्राओं का दाव लगाता हूँ। बलराम जी वो भी जीत गए। रुक्मी और अन्य राजा ये बात नहीं मान रहे थे। आकाशवाणी हुई, उसमें भी बलराम जी को ही विजेता घोषित किया गया किन्तु रुक्मी मानने को तैयार नहीं। बलराम को गुस्सा आ गया। उन्होंने गदा से रुक्मी का वध कर दिया। अन्य राजा भी भाग खड़े हुए। विवाह के मङ्गल प्रसङ्ग में रुक्मी के वध हो जाने के कारण रुक्मिणी रोने लगी। समाचार भगवान श्रीकृष्ण तक पहुँचे। भगवान ने तुरन्त सात्यिकी के साथ सन्देश भिजवाया कि विवाह मङ्गलमय हो इसलिए मैने आज सुबह से सात दिन का मौन व्रत लिया हुआ है। भगवान को ज्ञात था कि बलराम मेरे भाई और रुक्मी रुक्मिणी जी के भाई, किसका पक्ष लूँ? बलराम जी का पक्ष लूँगा तो रुक्मिणी रुष्ट हो जाएगी। अतः मौन रहना ही श्रेयस्कर है। बुद्धिमान व्यक्ति को पता होता है कि कब मौन रहना है? द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म पितामह मौन रहे उसका उनको दोष लगा क्योंकि वहाँ मौन नहीं रहना चाहिए था, उनका कर्त्तव्य था वहाँ पर बोलना। किन्तु यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण का

कोई कर्त्तव्य नहीं है और उन्होंने मौन रहना उचित समझा।

चौथी आन्तरिक शक्ति है मन!

आधे से अधिक झगड़े उसके होते हैं जिसका मन

उसके नियन्त्रण में नहीं होता है। वह अपने मन के वशीभूत होकर इतना गलत बोलता है कि उसे बाद में अपना माथा पीटना पड़ता है कि यह मैंने क्या बोल दिया? मेरे मन में तो उसके लिए इतना कुछ था भी नहीं। यह व्यक्ति हमेशा पछताता है। इसलिए इस मन को बुद्धि के नीचे कीजिए। जिसकी बुद्धि मन के नीचे है वह सदैव अपना नाश करता है और जिसका मन बुद्धि के नीचे आ गया, उसका सदैव कल्याण होता है। जो जितना मन के वशीभूत होगा वह उतने अपशब्दों का प्रयोग करेगा और छोटी सी बात पर बड़ा झगड़ा कर लेगा। जिसकी बुद्धि का उसके मन पर नियन्त्रण नहीं उसका नाश तय है। अतः मन पर नियन्त्रण सर्वाधिक आवश्यक है।

बहिर्करण

  • 1. विधि (Dos)
  • २. निषेध ( Don'ts)
  • विधि (Dos):-

बोलते समय हमें निम्नलिखित आठ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1.सत्यं प्रियम हितं च यत्।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।

सत्य बोलो, प्रिय बोलो, हितकारी बोलो। कई लोग सत्य को ढाल बनाकर अप्रिय बोलते हैं और कहते हैं कि हम तो सत्य बोलते हैं किसी को बुरा लगे तो लगे।

2. सही शब्द और भाषा का प्रयोग:-

अच्छी शब्दावली और भाषा का हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। एक व्यक्ति ने कहा कि मैंने फ्लैट लिया है। उसके बारह

वर्ष के बेटे ने कहा कि इन्होंने पेंट हाऊस लिया है। उस व्यक्ति ने कहा कि पेंट हाऊस क्या होता है? तब बच्चे ने उत्तर दिया जब किसी इमारत के सबसे ऊपर के दो फ्लैटों को मिला कर लिया जाता है तो उसे पेंट हाऊस कहते हैं। सही शब्दों के चयन से वाणी की सुन्दरता, उसकी कीमत बढ़ जाती है। बड़ा व्यक्ति छोटे व्यक्ति को नमस्कार नहीं करेगा। छोटा बड़े को आदरणीय लिखेगा और बड़ा छोटे को प्रिय लिखेगा। स्वामी जी के लिए हम प्रिय नहीं लिख सकते वे हमारे लिए परम पूजनीय हैं। वे हमारे लिए प्रिय लिख सकते हैं।

3. सही वोल्यूम का प्रयोग:-

हमारे शब्दों की तीव्रता कितनी हो, कितनी जोर से बोला जाए कितनी धीरे बोला जाए। सिकन्दर भारत आया। एक पूर्व की कथा भी है। सिकन्दर चाहता था कि वह पोरस के दरबार को देखे, उसके राज्य को देखे किन्तु शत्रु होने के कारण वह सीधे ही ऐसा नहीं कर सकता था। इसलिए उसने दूत का भेष धरा और पोरस राजा के दरबार में आया। सन्धि सन्देश लाया था। दूत अवध्य होता है। पुराने समय में भी होता था।

हनुमानजी रावण के दरबार में दूत बन कर ही गए थे। जब रावण ने कहा कि मारो इसे तब माल्यवान तुरन्त खड़े हो गए-

नीति बिरोध न मारिअ दूता।

दूत को मार नहीं सकते हैं। आजकल भी राजदूतों को मार नहीं सकते हैं।

4. सही समय का चुनाव:-

हर समय बोलना अच्छा नहीं होता है। कुछ बातों का तुरन्त उत्तर देना अच्छा होता है, कुछ बातों का उत्तर रुक कर देना चाहिए। जो लोग सही समय का विचार नहीं करते वो प्रायः परेशानी में आ जाते है। बिना माँगे सलाह देने वाले इसमें बहुत फँसते हैं।

5. सही मात्रा का चुनाव:-

कितना बोलना आवश्यक है। कई बार एक पंक्ति के उत्तर में काम चल जाता है और हम पूरा भाषण ही दे देते हैं। सभी बड़े ज्ञानी जनों के बीच में यदि हमसे कोई बात पूछी जाए और हम संक्षिप्त में उत्तर न देकर अपना ज्ञान बताने लगते हैं तो यह वाणी का दोष बन जाता है। हमें कितना बोलना चाहिए इसका बड़ा विचार करना चाहिए।

6. सबको सम्मान देने का भाव:-

कई बार किसी की बात काटनी भी होती है। जैसे आपने न्यायपालिका में देखा होगा वकीलों को तो दूसरे की बात काटनी ही होती है लेकिन वो कितने अच्छे तरीके से बात काटते हैं- मेरे काबिल दोस्त भूल गए अभी आपने जो बात कही वो इस प्रकार से है। दूसरे वकील की बात काट भी रहे हैं तो उसे सम्मान देकर। अपनी वाणी से किसी के सम्मान को चोट नहीं पहुँचनी चाहिए। यदि किसी की बात काटनी भी है, उसे मना भी करना है तो उसके सम्मान को रखते हुए। छोटा हो यत् बड़ा उसके सम्मान को रखते हुए ही उसकी बात काटनी चाहिए। जितना अधिक हम दूसरे को सम्मान देते हुए बात करते हैं उतना ही अधिक मेरी वाणी का गौरव बढ़ता है।

7. सही तथ्यों के साथ बोलें:-

सही तथ्यों के साथ बात करें। इधर-उधर से पढ़कर सही तथ्यों को जाने बिना अन्दाजे से बात नहीं करनी चाहिए। ऐसा व्यक्ति सदैव धोखा ही खाता है। “कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा” इस प्रकार का काम करके बात करना उचित नहीं है। जिसे तथ्यों के बिना बोलने की आदत हो जाती है, समाज में उसकी सही बात की भी उपेक्षा होती है, उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता है।

8. अधिकार होने पर ही बोलें:-

अधिकार, योग्यता अथवा पात्रता होने पर ही बोलना चाहिए। कार्यकर्ता रूप में इसका उदाहरण देखते हैं। यदि आप तकनीकी विभाग में सेवा दे रहे हैं और प्रशिक्षक विभाग के लिए सुझाव भेज रहे हैं या प्रशिक्षक विभाग में सेवा दे रहे हैं और तकनीकी विभाग के लिए सुझाव भेज रहे हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें बताना पड़ता है कि यह कार्य पूर्व से ही किया जा रहा है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या यहाँ पर बोलना मेरे अधिकार क्षेत्र में है अथवा नहीं। हमारा ज्ञान, पद, योग्यता आदि का ध्यान रख कर विषय विशेष और परिस्थिति विशेष में बोलना चाहिए। बिना

ज्ञान के ही हमें विभिन्न विषयों का विशेषज्ञ नहीं बनना चाहिए और न ही बोलना चाहिए।

2- निषेध ( Don'ts)

  • निषेध:-

बोलने में निषेध भी आठ बताए गए हैं-

1. अवाच्यवादांश्च का निषेध:-

अवाच्यवादांश्च अर्थात् नहीं बोलने वाले शब्द अथवा अपशब्द मुख से नहीं निकालने चाहिए। कठोर बात कहने के लिए भी सुन्दर शब्दों का चयन कीजिए।

2. आलोचना का निषेध :-

आलोचना से बचें। जहाँ तक हो सके किसी की आलोचना न करें। भगवान को निन्दा बिल्कुल भी प्रिय नहीं है। अर्जुन को भगवान ने कई स्थानों पर अनसूय कहा है अर्थात् जो किसी की कभी निन्दा नहीं करता हो। अपैशुनम् को भगवान ने दैवीय गुण कहा है। अपैशुनम् अर्थात् जो कभी किसी की

आलोचना अथवा चुगली न करे।

3. पूर्वाग्रह का निषेध :-

पूर्वाग्रहों से बचें। कई बार हमारे किसी के प्रति पूर्वाग्रह होते हैं तो हम उसकी बात अवश्य काटेंगे, इस बात से हमें कोई मतलब नहीं कि वह सही है या गलत। जैसे आजकल हमारे देश में विपक्ष है, मोदी जी अच्छा भी करें तो भी उसे विरोध ही करना है। किसी को उसके पूर्व में किए गए व्यवहार के आधार पर आंकलित मत कीजिए।

4. किसी को भी अपमानित करने का निषेध :-

किसी को भी अपमानित न करें। कोई भी परिस्थिति हो किसी के मान का हरण नहीं करना चाहिए।

5. विषयांतर करने का निषेध :-

विषयांतर नहीं करना चाहिए। बैठक किसी अन्य विषय के लिए बुलाई गई है और आप किसी अन्य विषय को लेकर बोलने लगें, यह उचित नहीं है। यह वाणी के तेज को घटाता है इसलिए विषयांतर करने से बचना चाहिए।

6. किसी की बात का खण्डन करने का निषेध :-

किसी बात का खण्डन करने से बचें। यदि आप बात से सहमत नहीं हैं तो आप मंडन मत कीजिए लेकिन उस बात का खण्डन भी करना आवश्यक नहीं है, ऐसी स्थिति में मौन भी रहा जा सकता है।

7. आग्रह का निषेध :-

आग्रह करने से बचें कि मेरी ही बात मानी जाए। दस लोग जो बैठक में आए हैं और हम आग्रह करें कि अन्य नौ लोग मेरी ही बात मान जाएँ, यह उचित नहीं है। परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदास जी महाराज का बड़ा सुन्दर सूत्र है - जीवन में यह हो जाए और यह न हो, इसका जो आग्रह छोड़ देता है, वह परम सुखी हो जाता है। समस्त सुखों के नाश का

कारण हमारा यह आग्रह ही होता है कि यह तो ऐसे हो और यह ऐसे न हो। लोग हमारी तो सुनते नहीं हैं, वे अपने अनुसार कार्य करते हैं और हम अपने आग्रह के कारण दुःखी रहते हैं। इस प्रकार आग्रह करने वाले लोगों को बैठकों में बुलाना भी छोड़ दिया जाता है क्योंकि सभी को यह लगता है कि वह आकर किसी की सुनेगा नहीं और अपनी-अपनी ही सुनाएगा। आग्रह करने वाले लोगों की सब उपेक्षा करते हैं, उन्हें कोई अपने पास बैठाना भी पसन्द नहीं करता है। लोग उन्हें पसन्द करते हैं जो अपनी राय बताकर निर्णय सामने वाले की इच्छा पर छोड़ देता है। जैसा भगवान ने अर्जुन से कहा कि मैंने तुम्हें सम्पूर्ण भगवद्गीता बता दी, सारा ज्ञान दे दिया। अब जैसे तुम्हें ठीक लगे वैसा करो। अट्ठारहवें अध्याय के अन्तिम भाग में भगवान कहते हैं-

यथेच्छसि तथा कुरु

(जैसा तुम चाहो, वैसा करो)

भगवान ने यह नहीं कहा कि ऐसा ही करो।

8. सीधा किसी को गलत कहने का निषेध :-

किसी को सीधा गलत कहने से बचें, इससे आपके सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं। आपको दिख रहा है कि वह व्यक्ति गलत है किन्तु उसे सीधे गलत कहने से बचें। सीधे गलत कहने से परिवार और समाज में सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं।

कर्म व्यवहार का पुनः अवलोकन करते हैं-

  • 1.मनसा
  • 2. वाचा
  • 3.कर्मणा

ये तीन प्रकार से कर्म होते हैं।

आज वाणी का विचार किया। ये दो प्रकार की होती है-

1. अन्तः करण :-

इसके चार भाग होते हैं- अहम्, चित्त, बुद्धि और मन।

2. बहिर्करण:-

इसके दो भाग होते हैं- विधि और निषेध।

आज हमने ये चिन्तन किया कि किस प्रकार हमारी वाणी प्रभावशाली बने, वाणी का अलङ्कार किस प्रकार बढ़े। यह चिन्तन हमें स्वयं के लिए करना है, किसी अन्य के लिए नहीं, यह बात हमें ध्यान रखनी है।

॥ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥

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