सम्पूर्ण गीता पारायण (25वाँ)

जगद्गुरु श्रीकृष्ण और गीता परिवार के संस्थापक परम पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज के चरणों में नमन करते हुए 10वें मार्च को पंचविंश सम्पूर्ण गीता पारायण का शुभारम्भ किया गया। स्मिता मूंदड़ा दीदी द्वारा प्रार्थना से इसका शुभारम्भ हुआ। दीप प्रज्वलन के पश्चात् संचालक कमलवरा कौशल दीदी ने उपस्थित सभी का स्वागत किया। उन्होंने ये बताया कि इन पच्चीस पारायणों में सभी विभागो से 430 सदस्यों ने भाग लिया है। अभी रजत पारायण, अर्थात पच्चीसवें पारायण में गीता परिवार के वरिष्ठ सदस्यों और प्रशिक्षकों को पाठ करने के लिए आमंत्रित किया गया है।
सर्वप्रथम गीता विशारद आदरणीय श्रीनिवास वर्णेकर काकाजी ने न्यास, गीता माहात्म्य और ध्यान से प्रारम्भ करते हुए प्रथम अध्याय का पाठ किया।
इसके पश्चात् क्रमश: श्रुति कटगांवकर जी ने द्वितीय अध्याय, आ. विजय गोडबोले जी ने तृतीय अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक हिरल वैद्य जी ने चतुर्थ अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक विजय राजू जी ने पञ्चम अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक हिरल पटेल जी ने षष्ठ अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक विद्या राव जी ने सप्त अध्याय, आ. सुवर्णा मालपाणी काकी जी ने अष्टम अध्याय, आ. वंदना वर्णेकर काकी जी ने नवम अध्याय, सुश्री रूपल शुक्ला दीदी ने दशम अध्याय, सुश्री ज्योति शुक्ला दीदी ने एकादश अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक श्री अशोक कुमार शर्मा जी ने द्वादश अध्याय, आ. श्री विकास वैद्य दादा ने त्रयोदश अध्याय, आ. श्रद्धा रावदेव दीदी ने चतुर्दश अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक रूपा ज़रिये दीदी ने पञ्चदश अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक सोनालिका रॉय दीदी ने षोडश अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक प्रिया सत्यम दीदी ने सप्तदश अध्याय, वरिष्ठ प्रशिक्षक तन्वी देसाई दीदी ने अष्टादश अध्याय पाठ किये।
अष्टादश अध्यायों के पारायण के पश्चात् वरिष्ठ प्रशिक्षक तन्वी देसाई दीदी क्षमाप्रार्थना की।
उसके पश्चात् संचालक जी ने गीता परिवार के अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष और लर्नगीता के प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. आशू जी गोयल भैया को मंच पर आमंत्रित किया। आ. आशू भैया श्रीकृष्ण और गुरुदेव के चरण वंदन करके सभी
को रजत पारायण में भाग लेने और साक्षी बनने के लिए अभिनन्दन करते हैं। पारायण के प्रसंग में उन्होंने कहा कि शास्त्रों का पूर्ण लाभ मिलता है जब वह मनसा-वाचा-कर्मणा तीनो रूप जीवन में लाया जाये। बहुत लोगो का मानना है कि बिना अर्थ समझे रटे हुए शास्त्र पाठ करना निष्फल है। पर वे यह नहीं जानते कि पढ़ते पढ़ते अर्थ समझ में आने ही लगता है। और बात अर्थ ज्ञात होने की नहीं, कर्म में उसकी झलक की है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है - खग ही जाने खग की भाषा। तो इस प्रकार की पारायण का क्या
अनुभव होता है ये वही जान सकता है जो उस पारायण में सम्मिलित हुए हों। जब तक पारायण का रस किसी ने लिया नहीं तब तक दूर बैठकर इसकी आलोचना करके इसे समझना मुश्किल बात है। जो इस पारायण में लगे, वह भगवान के अत्यंत प्रिय जीव है। भगवान के प्रत्यक्ष कृपा उस पर बरस रही है। हम अपने घर में भी पारायण करते हैं। उसका भी भारी महत्त्व है, भारी पुण्य भी है, बड़ा लाभ भी है। लेकिन कीर्तन और पारायण ये दो व्यक्तिगत से सामूहिक करने पर उसका प्रभाव करोड़ो गुना अधिक माना गया है। अगर सौ लोग मिलकर पारायण कर रहे है, तो उसका प्रभाव सौ नहीं, करोड़ो गुना हो जाता है ऐसा अनेक महापुरुषों ने शास्त्रकारों ने बारम्बार कहा है। गीता परिवार के इस रजत आयोजन पर सबका श्रद्धाभाव बड़ी आनंददायक है। आ. सुवर्णा काकी जी के सान्निध्य में हमने ये पारायण करना सीखें, इनकी कल्पना कर पाए हैं। आ. श्रुति दीदी, मनीषा बर्धन दीदी, मनीषा भरद्वाज दीदी आदि कार्यकर्ताओं ने इनका आयोजन इतना निपुण किया। कोई भी कार्य बिना योजना के या बिना लगन के होता नहीं। भगवान गीता में कहता हैं - योगः कर्मसु कौशलम्। Whatever you do, do it with utmost perfection. सारा काम ये utmost perfection से कैसे संभव हो रहा है?
18 अध्याय के 14 श्लोक में भगवान ने कहा -
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥14॥
बाकि सभी चार करण उपलब्ध हो भी जाय किन्तु जब तक भगवान की कृपा नहीं होती, कार्य सफल नहीं होता। तो गीता परिवार के लर्नगीता के हर संकल्प पर भगवान की इतनी कृपा बरसती है कि हमलोग जो सोचते हैं वह भगवान अपने आप ही पूरा करा देते हैं ऐसा लगता है। हम थोड़ा उत्साह लेकर उस काम में लगते हैं और हजारों लोग उस कार्य को सफल करने के लिए जुड़ जाते हैं।
हमलोग पञ्चविंश पारायण पूरा कर रहें हैं। संत ज्ञानेश्वर भगवान के कहा - गीता विवेक रूपी वृक्षों का अपूर्व बगीचा है। जितना जितना हम उसका पाठ करते जाते है उतना हमारा विवेक जाग्रत होता है।
हमारी प्रज्ञा का विकास होता है और हमारे भीतर शांति और धैर्य का निर्माण हो जाता है। अर्थ समझकर जीवन में लाना बहुत अच्छी बात है। लेकिन वह हो या न हो, केवल पारायण मात्र से अपने जीवन के सारे अंग बदलने लगते है। अपना शरीर, मन गीता के मन्त्रों से प्रभावित होते हैं। 574 श्लोक भगवान के श्रीमुखारविन्द से प्रस्फुटित हुए हैं। इसलिए सारे श्लोक मंत्रमय हैं। हम जैसे ही अपने कंठ में धारण करते हैं हमारा वाणी पवित्र हो जाता है। पूज्य स्वामीजी कहते हैं की हमारे ब्रेन का प्रोग्रामिंग ही चेंज हो जाता है। भगवान इस प्रकार का हमें पुण्य अवसर दे रहें हैं ही हम बारंबार अपनी घर बैठे, अपनी सुविधा से इतने बड़े पुण्यों का आयोजन कर पा रहे हैं। ये भगवान की और स्वामीजी की अत्यंत महती कृपा है। ये कृपा अविरत हम लोगो पर बहती रहें। ऐसी प्रार्थना के साथ आ. आशू भैया ने पुनः सबको अभिनन्दन किये।
इसके बाद गीता आरती सम्पूर्ण हुई। तत्पश्चात् वरिष्ठ प्रशिक्षक श्रुति नायक दीदी धन्यवाद ज्ञापन हेतु ज़ूम मंच पर पधारी। आ. आशू भैया के मार्गदर्शन से पिछले 6 महीनों से ये पारायण चल रहा है। इस पारायण को सम्भव करने के लिए और 'पारायण के लाभ' पर हमें मार्गदर्शन करने के लिए उनका धनवाद किया। पारायणकारों को और समापन प्रार्थना के लिए धर्मेश शाह भैया को भी धन्यवाद प्रकट किया। सर्वशेष समापन प्रार्थना के बाद सभी ने हनुमान चालीसा का सामूहिक गायन किया। अगले
सप्ताह का पारायण के लिए सबको आमन्त्रित करते हुए कमलवरा कौशल दीदी ने सत्र समापन की।
आदि शंकराचार्य भगवान के एक स्थान पर कहा कि अगर ध्यान करना हो तो विष्णु भगवान का ध्यान करें, चित्त में पिरोना हो तो सज्जनो के संग को इस तरह पिरोये, दीन-दुखियों को देना हो तो वित्त का आयोजन करें और गाने के लिए कभी कुछ मन हो तो श्रीमद्भगवद्गीता गायें।
गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम्॥27॥


