
Gītā Vicakṣaṇa Opening Ceremony
लर्नगीता प्रकल्प नित नवीन आयामों को जन्म दे रहा है एवं इसी क्रम में गीता के अर्थ को भी कंठस्थ करके समझने हेतु नवीन वर्ग का आरंभ किया जा रहा है। इस वर्ग में जिन साधकों ने श्लोकांक से गीता को कंठस्थ कर लिया है उन्हें प्रवेश दिया जा रहा है।
Gītā Vicakṣaṇa
Opening Ceremony
Shlokartha Classes
01/01/24
श्रीमती रचना मुकेश टंडन दीदी ने परम पिता परमेश्वर एवं परम श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के चरणों में वंदन करते हुए श्लोकार्थ कक्षा के सभी साधकों का स्वागत व अभिनंदन किया। रचना दीदी ने बहुत सुन्दर बात कही कि हम प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर से अपनी प्रत्येक बात साझा कर सकते हैं एवं अपने मन में समाधान भी प्राप्त कर सकते हैं। कार्यक्रम का आरंभ प्रार्थना के साथ श्री सुधीर भैया ने किया। सुधीर भैया गीता परिवार में विभिन्न प्रकार की सेवाएँ दे रहे हैं एवं भैया ने गीता विचक्षण परीक्षा उत्तीर्ण की है। बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत्त सुधीर भैया वर्धा महाराष्ट्र से हैं ।
जीवन में प्रकाश आता है दीपों से, हमारी संस्कृति में सदैव ही दीप प्रज्ज्वलन की परम्परा रही है तो उसी प्रकार गीता परिवार में भी। आज का दीप प्रज्ज्वलन मुंबई महाराष्ट्र से वैशाली दीदी ने किया। दीदी 2021 से गीता परिवार में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही हैं।
इसके साथ ही अमेरिका से 67 वर्षीय इंदु शर्मा दीदी, जयपुर से 68 वर्षीय घनश्याम शर्मा भैया ने श्लोकांक से श्लोक
उच्चारण किये। जिस आयु में मनुष्य रोजमर्रा की बातें भूलने लगते हैं आप ने श्लोकांक से श्लोक वाचन कर अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया। विजयवाड़ा से सुनीता सोमानी दीदी ने श्लोकार्थ के साथ श्लोक वाचन किये जो अपने आप में अद्भुत था।
श्लोकार्थ की कक्षाओं के विषय में जानकारी देते हुए ख्याति दीदी ने बताया कि गीताव्रती के पश्चात् गीता विचक्षण अर्थात् श्लोकांक से गीता जी कंठस्थीकरण के उपरांत हमें श्लोकार्थ की कक्षा में प्रवेश मिलता है। आप सभी अत्यंत भाग्यशाली हैं कि यह श्लोकार्थ की प्रथम ही बैच है तथा इस प्रथम बैच में आपका चयन हुआ है ।

ख्याति दीदी ने सभी का पुनः अभिवादन करते हुए आगे बताया कि श्लोकांक की प्रथम बैच 5 कक्षाओं के साथ 20 मार्च से प्रारंभ हुई थी। श्लोकांक की द्वितीय बैच 12 कक्षाओं के साथ प्रारंभ हुई जिसमें लगभग 270 साधक थे जो गीता पथिक एवं गीताव्रती थे। इस समय श्लोकांक के 15 समूह, 6 समय सत्रों में लगभग 370 साधकों के साथ चल रहे हैं ।
अत्यंत हर्ष का विषय है कि अब हमारी गीता कक्षाओं में श्लोकार्थ कक्षा का एक रत्न और भी जुड़ने जा रहा है। ख्याति दीदी ने बताया कि गीताव्रती में मूल गीता कंठस्थ करनी होती है गीता विचक्षण में अंकों से श्लोक स्मरण रखने होते हैं श्लोकार्थ की विलक्षण बात यह है कि इसमें गीता जी के श्लोकों के अर्थ का विस्तार से अध्ययन किया जाता है।
यह चिंतन की नहीं अपितु अर्थ की कक्षायें हैं। श्लोकार्थ समझने एवं कंठस्थीकरण हेतु हमें गीता प्रेस गोरखपुर की अन्वय गीता का प्रयोग करना होगा।
गीता प्रात्यक्षिक में गीता विचक्षण अशोक भैया ने 12वें अध्याय भक्तियोग के श्लोकों का पदच्छेद करते हुए सुन्दर अर्थ समझाया। इसी क्रम में उषा सुब्रह्मण्यम दीदी ने भी सुंदर श्लोक का गायन किया।
लर्न गीता कार्यक्रम के कार्यक्रम निदेशक एवं गीता परिवार के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आ. आशू गोयल भैया ने श्लोकार्थ कक्षाओं के शुभारम्भ वर्ग में साधकों का उत्साहवर्धन करते हुए बताया कि 18वें अध्याय के 14वें श्लोक भगवान श्रीकृष्ण क्या कह रहे हैं-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥18:14॥
भगवान ने इस श्लोक में ऐसा सूत्र दे दिया है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, चाहे ज्ञानार्जन अथवा धनार्जन, आध्यात्म हो अथवा भगवत्प्राप्ति, इहलौकिक हो अथवा पारलौकिक सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त करने हेतु कर्म सिद्धि के पाँच अचूक कारक हैं :
किसी भी कार्य की सिद्धि निम्न बातों पर निर्भर करती है :-
1) अधिष्ठान -
उद्देश्य हमें अपने कर्म का मूल उद्देश्य पता होना चाहिए अन्यथा कर्म सिद्धि नहीं होगी।
2) कर्ता -
कार्य करने वाला कौन है पूर्ण समर्पित है अथवा नहीं! क्योंकि कोई भी कार्य पूर्ण समर्पण चाहता है।
3) करण -
किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए आवश्यक है विभिन्न प्रकार के साधन।
4) चेष्टा -
साधन तो उपलब्ध हो गये किन्तु पर्याप्त प्रयास नहीं किया।
5) दैव -
सब कारक उपलब्ध हैं किन्तु परमात्मा की इच्छा नहीं है तो कार्य सिद्धि नहीं हो पाती।
किसी एक साधन की कमी हो तो दूसरे साधन को अधिक प्रयोग करके कार्य सिद्धि का प्रयत्न करने से सफलता की संभावना बढ़ जाती है। इसी क्रम में भैया ने बताया कि गीता जी का प्रत्येक श्लोक अपने में कई गूढ़ अर्थ समेटे हुए है अतः श्लोकार्थ कक्षा में अध्ययन हेतु महान संतों की लिखी हुई टीकायें उपलब्ध हैं। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी महाराज की साधक संजीवनी, अन्वय गीता, गीता प्रबोधिनी के अतिरिक्त परम श्रद्धेय सेठजी श्री जयदयाल जी गोयन्दका जी की तत्त्व विवेचनी, अद्वैत मत पर आदि शंकराचार्य जी का शांकरभाष्य, संत ज्ञानेश्वर महाराज की ज्ञानेश्वरी, द्वैतभाव में स्वामी रामानुजाचार्य जी का श्रीभाष्य, कर्मयोग पर आधारित मूल मराठी में आदरणीय तिलक जी की गीतारहस्य, श्रीधर टीका, मधुसूदन शास्त्री जी का भाष्य इसप्रकार अनेक सुन्दर टीकायें उपलब्ध हैं जो आपको गीता जी में निहितार्थ को समझने में सहायक होंगी। इसके अतिरिक्त आधुनिक अथवा पाश्चात्य अर्थ में गीता जी को समझना चाहते हैं तो ओशो गीता जो कि 8 वॉल्यूम में है उसे भी पढ़कर देखिए किन्तु उस पर रुकिए नहीं वापस लौटकर साधक संजीवनी, ज्ञानेश्वरी, गीताई, तत्त्व विवेचनी पर आइए एवं पाश्चात्य उन्मुक्तता भौतिक वाद एवं मूल सनातन के अंतर का अनुभव
कीजिए एवं अपने विचार साझा करें।
परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का सूत्र गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें तभी सार्थक होगा जब हम अर्थ समझेंगे क्योंकि जब हम अर्थ समझेंगे तभी जीवन में प्रयोग कर सकेंगे।
इसी सन्दर्भ में IITK (IIT कानपुर ) के छात्रों एवं प्रोफेसर्स ने श्रीमद्भगवद्गीता पर एक बहुत उपयोगी website बनाई, 'gitasupersite' उसका नाम है। उस पर कई विद्वानों के भाष्य हैं। उपरोक्त में से आपको जो भी भाष्य सुलभता से उपलब्ध हो सके
अपने श्लोकार्थ अध्ययन में उनसे पढ़ने का प्रयास अवश्य करें। परम श्रद्धेय स्वामी गोविंददेव गिरिजी महाराज द्वारा गीता भाष्य अनन्य शोध के साथ सर्वथा निरपेक्ष भाव से लिखा जा रहा है जिसपर श्लोकार्थ कक्षा के स्वाध्यायी साधकों के विचार आमंत्रित किये जायेंगे। अत: आप सभी से निवेदन है
कि स्वाध्याय कीजिए एवं इस विषय में अपने विचार अवश्य दीजिए।
आशू गोयल भैया ने श्लोकार्थ वर्ग के शुभारंभ के अवसर पर बताया कि आज हरिद्वार की पावनभूमि एवं पतित पावनी गंगा जी के तट से सभी साधकों को संबोधित करने में उन्हें बहुत आनंद का अनुभव हो रहा है। उन्होंने सभी साधकों को गीताव्रती, गीता-विचक्षण होने पर अनेकानेक शुभकामनायें दीं एवं श्लोकार्थ कक्षा में प्रवेश हेतु स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि गीता जी के ज्ञानमय प्रकाश से विश्व को आलोकित करने में गीता परिवार के साथ-साथ चलें। वैदिक ऋषियों ने 'चरैवेति-चरैवेति' कहा है। जीवन गति का नाम है, प्रगति है, आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है तथा एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रहना।
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते हृवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ 3:5॥
डॉ. आशू जी गोयल भैया ने अत्यन्त भावपूर्ण होते हुए परमात्मा से निवेदन किया कि वे हम सभी पर अपनी कृपा-वृष्टि करें जिससे हम सभी इस गीता ज्ञान यज्ञ में अपनी अपनी आहुतियाँ डालते हुए इसकी ज्ञान रूपी अग्नि के दिव्य तेज को अखिल विश्व में प्रसारित करने एवं प्रकाशित करने में निरन्तर सेवारत रहें। समारोह की सूत्रधार श्रीमती रचना मुकेश टंडन दीदी ने आशू भैया को उनके स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन करने हेतु हार्दिक आभार निवेदित किया।
गीता विचक्षण छवि दीदी, परभणी महाराष्ट्र से शिल्पा राठी दीदी, पुणे से ज्योति हेमंत जोशी दीदी, वडोदरा गुजरात से ओमप्रकाश भैया, अहमदनगर महाराष्ट्र से विद्या भालेराव दीदी, ठाणे मुंबई से डॉक्टर रमेश चक्षौता भैया, मीनल दानी दीदी, विष्णुकांता दीदी, कोलकाता से बबीता दीदी, नागपुर महाराष्ट्र से अनुश्री दीदी, जलगांव महाराष्ट्र से अर्चना पाटिल दीदी आदि सभी ने गीता विचक्षण किया हैं एवं अब श्लोकार्थ की कक्षा में प्रवेश लिया है। सूरत गुजरात से नीरु दीदी विचक्षण की तैयारी कर रही हैं, गीताव्रती राजश्री दीदी सांगली महाराष्ट्र से हैं एवं ऑफलाइन गीता क्लास लेती हैं। अहमदाबाद से गीता पथिक विनीता बाघेला दीदी ने बहुत सुंदर बात कही कि परिवार में वृद्ध जनों का जिस प्रकार आशीर्वाद मिलता है गीता परिवार में वैसी ही छत्रछाया प्रतीत होती है ।
आ. आशू भैया ने गीता परिवार की प्रथम गीता
विचक्षण रूपा दीदी का विशेष आभार व्यक्त किया। गीता विचक्षण कक्षाओं के निर्माण में रूपा दीदी की विशेष भूमिका रही। उपस्थित सभी साधकों ने अपने-अपने मनोगत व्यक्त किये। इसके पश्चात् पुणे से C.A. मृदुला दीदी ने प्रभाव पूर्ण शब्दों में इस गीता यात्रा में अब तक जितने भी सहयात्री मिले उन सभी का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।
समापन प्रार्थना गाजियाबाद से डॉ. किरण दीदी ने ली। रचना दीदी ने पुन: धन्यवाद करते हुए हनुमान चालीसा के पाठ के साथ इस सुंदर कार्यक्रम की पूर्णाहुति की।




