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गीता मैत्री अंक ७जनवरी से जून २०२४
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
०३कार्याध्यक्ष का संदेश

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।

भगवद्गीता विजय का शास्त्र है। रणांगण में दुविधा से हतप्रद अर्जुन का गिरा हुआ गाण्डीव पुनः उसे उठाने की प्रेरणा देने हेतु तथा उसे युद्ध में विजय प्राप्त हो इस कारण से ही गीता का उद्भव हुआ।

डॉ. संजय मालपाणी
राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, गीता परिवार

जून - जुलाई में अनेक छात्रों से मेरा वार्तालाप होता है। कौन से महाविद्यालय में तथा किस कोर्स में प्रवेश लेना है इस दुविधा से घिरे अनेक छात्र एवं अभिभावक मुझे मिलने पहुँचते हैं। किसी छात्र को भाषा विषय में रूचि होती है परंतु अभिभावक उसे विज्ञान और अभियांत्रिकी करने की सलाह देकर एवं जबरदस्ती करने हेतु मेरे पास ले आते हैं।

पिछले दिनों ऐसे ही एक छात्र ने ११वीं की परीक्षा नहीं दी और घर पर वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ है ऐसा बताया। जब घर वालों को सच्चाई का पता चला तो बालक घर से भाग गया। पुलिस की सहायता से बालक का पता चला तो उसे पकड़कर घर लाया गया। अगले दिन पिता बालक को लेकर मेरे पास पहुँचे। मैने उससे अकेले में बात की तो पता चला कि उसे कला शाखा में भाषाओं का अभ्यास करना था, परन्तु पिता ने उसे जबरदस्ती से विज्ञान शाखा में दाखिला करवाया। छात्र आरम्भ में कुछ दिन महाविद्यालय गया परंतु उसे रसायन शास्त्र, पदार्थ विज्ञान आदि विषयों में बिलकुल भी मजा नहीं आयी तो उसने कॉलेज में जाना ही बंद कर दिया। परिणामस्वरुप वह अनुत्तीर्ण हुआ। अब उसे ११वीं की परीक्षा पुनः देकर 12वीं में कला शाखा में प्रवेश देने का आश्वासन दिया गया। परिजनों को भी अपनी गलती समझ में आयी और मुझे यह विश्वास है की यह छात्र भाषा शास्त्र में निश्चित ही बहुत आगे पहुँचेगा।

अमरीका में डॉ. हॉवर्ड गार्डनर नामक एक संशोधक ने 1982 में अपना एक संशोधन प्रकाशित किया। उन्होंने आठ प्रकार की मूलभूत बुद्धिमत्ताओं के मस्तिष्क में केंद्र कहाँ हैं यह सिद्ध किया। इसमें भाषिक, तार्किक, सांगीतिक, अंतर व्यक्तिगत, परस्पर व्यक्तिगत, शारीरिक, प्राकृतिक तथा अवकाशीय बुद्धिमत्ता इन 8 मूलभूत बुद्धिमत्ताओं का समावेश है। एक बहुत बड़ा बदलाव इस संशोधन के पश्चात् शिक्षा क्षेत्र में आया। हर छात्र की कौनसे प्रकार की बुद्धिमत्ता अधिक है यह जानकर उसे उससे संबंधित क्रियाकलापों में आगे बढ़ने से छात्र अपनी क्षमता का सर्वोत्तम प्रदर्शन कर सकता है, यह सिद्ध हुआ। सारे विश्व के शिक्षा क्षेत्र में इस संशोधन के आधार पर बडे परिवर्तन किये गये। परंतु गीता में यह बात भगवान श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले अर्जुन को कही। भगवान कहते है

कि जो अपने अंदर छिपी क्षमता को अपना कर्म बना लेता हैं उसे उस क्षेत्र में सिद्धि याने यशस्विता प्राप्त हो जाती है।

अर्जुन श्रेष्ठ धनुर्धर एवं योद्धा है। अर्जुन कर्म एवं गुणों से सर्वोत्तम क्षत्रिय है। अतः उसका धर्म सज्जनों की रक्षा एवं दुर्जनों का विनाश करना हैं। उसे सन्यास या अन्य विचार का त्याग कर युद्ध करना चाहिए। भगवान तो यह भी कहते हैं “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।” अर्थात् स्वधर्म का पालन करते हुए मृत्यु भी हो जाए तो ठीक है परंतु परधर्म भयावह होता हैं।

भगवान का “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” यह निर्देश हम सभी के लिए जीवन बदलने वाला हो सकता है। हमारा सहज स्वभाव क्या है इसकी खोज करने के पश्चात् हम उसी कार्य को अंगीकृत करते है तो जीवन आनंदमय बनता है। वह कार्य हमें बोझ नहीं लगता अपितु उस कार्य में हमें रस प्राप्त होता है। और उस कार्य में हम महारथ प्राप्त करके यशस्विता के शिखर पर पहुँचते है। अतः इस श्रीकृष्ण वचन को हमें सदैव याद रखकर उस पर मार्गक्रमण करना चाहिए।

  • डॉ. संजय मालपाणी
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