
अनुद्वेगता
अनुद्वेगता शब्द सामान्य व्यवहार में प्रचलित नहीं है, तथापि श्रीमद्भगवद्गीता में यह शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। द्वितीय अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं -
गीता विशारद डॉ आशू जी गोयल
(Saturday, April 24 L1 NPS)
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥2.56॥
पन्द्रहवें अध्याय में श्रीभगवान ने दो बार यह शब्द प्रयोग किया है –
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मेप्रियः ॥12.15॥
सत्रहवें अध्याय में श्रीभगवान जी ने कहा -
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥17.15॥
उत्तम वक्ता प्रथमत: वह बात कहता है, जो उस विषय से सम्बन्धित है और कहना आवश्यक है। यदि वक्ता उसी बात को दो बार कहे, तो निश्चय ही वह श्रोता को उस कथानक की महत्ता स्मरण करवाना चाहता है। उत्तम वक्ता उसी बात को तीसरी बार बताये तो समझिए कि -
वह श्रोता को शपथ दिलाना चाहता है। He wants to force it.
श्रीभगवान तो उत्तम वक्ता हैं, उनसे उत्तम वक्ता अन्य कोई नहीं है। उन्होंने तीन बार अर्जुन को अनुद्वेग की बात कही है।
अनुद्वेग- अर्थात उद्वेग से रहित होना।
अध्यात्म में इसका अत्यधिक महत्त्व है। एक वेदान्ती को पूछा -
ब्रह्म क्या है? उत्तर मिला - स्थिर मन ही ब्रह्म है। मन की स्थिरता ब्रह्म है।
महर्षि पतञ्जलि ने इसी को विस्तारित करके कहा -
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

आ. आशू भैया द्वारा इसकी अधिक स्पष्टता हेतु कुछ बिन्दु दियें -
1. दूसरे का कर्त्तव्य मेरा अधिकार नहीं - प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानन्द जी महाराज कहते हैं-
Duty of others is not my right.
हम दूसरे के कर्त्तव्य को अपना अधिकार मान लेते हैं। हमारा केवल स्वयं के कर्त्तव्य पर अधिकार है।
उसे ऐसा करना था, नहीं किया इसलिए मैं उससे असन्तुष्ट हूँ। उसने यदि अपना कर्त्तव्य पालन नहीं किया तो उसे उसका परिणाम भोगना पड़ेगा। जो देखने वाला है, वह उसे देखेगा।
अपना कर्त्तव्य और दूसरे का अधिकार विचार करना चाहिए। हम ठीक इसके विपरीत करते हैं।
माता - पिता, गुरु और स्वामी इन चारों को अधिकार है कि वे कर्त्तव्यबोध करा सकें। अन्य किसी को कर्त्तव्यबोध कराने का अधिकार नहीं है। हम बिना सोचे समझे सलाह देने लगते हैं। कोई व्यक्ति किसी के घर मिलने गया। गृहस्वामी जप कर रहा था, संयोगवश टेलीविजन भी चल रहा था। आगन्तुक टोकता है - ऐसे जप का क्या लाभ?
यहाँ विचारणीय है कि क्या आगन्तुक को टीका-टिप्पणी करना आवश्यक है? या आगन्तुक को ऐसी टीका-टिप्पणी करने का अधिकार है? अनावश्यक अनाधिकार हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
कबीरदास जी कहते हैं-
कबिरा तेरी झोंपड़ी गलकटियन के पास।
जो करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भया उदास ॥
2. धैर्य - सामान्य स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति धैर्यवान होते है। धैर्य की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। अरण्यकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
अनुकूलता में सभी धैर्य धारण करते हैं। प्रतिकूलता में गहन मित्र भी धैर्य खो देते हैं। काम और क्रोध के वेग को रोक लेना ही धैर्य है। इस वेग को न रोक सकें तो धैर्य चला जाता है इसीलिए कहते हैं - क्रोध आये तो पानी पी लो, दस तक गिनती कर लो, एक दिन रुक जाओ, आदि। क्रोध का वेग समय पाने पर कम हो जाता है। तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करने की अपेक्षा यदि हम कुछ समय रुक कर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं तो स्थिति सहज हो जाती है।
3. No shortcut - अधीर होकर हम शीघ्रता से गन्तव्य पा लेना चाहते हैं। त्वरित राहें हमें गन्तव्य तक नहीं पहुंचाती, बीच में ही खो जाती हैं। शीघ्र धनी बनने हेतु, पूँजी बाजार में पैसा लगाया साल-भर में दिवालिया हो गये। वजन घटाना है, योगासन करने की बजाय शल्यक्रिया करवाते हैं, शरीर में सङ्क्रमण हो जाता है। सिर पर हाथ रखने से कुण्डलिनी जागरण हो जाएगी, ऐसा मानकर बाबाओं को धन लुटाते हैं। ध्वनि विस्तारक से कह देते हैं - समाधि लग गयी। पिछलग्गू होकर मान लेते हैं कि बिना साधना किये ही, समाधि लग गयी। स्वयं प्रयास और परिश्रम न करना पड़े इसलिए बिना विचारे किसी के बहकावे में आ जाते हैं। परिश्रम कोई अन्य करें, श्रेय मुझे मिल जाए।
कबिरा कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाउं।
गले राम की जेवड़ी, जित खैचे तित जाउं॥

रामजी का पट्टा गले में बँधा है, वे जिधर खींच ले जाएँगे, उधर चला जाऊँगा।
4. Put yourself in others shoes - परिवार में, समाज में दूसरे सभी हमारे विचार से सहमत हों या हम दूसरों के विचारों और कार्यप्रणाली से सहमत हों, यह सदैव सम्भव नहीं है। सामने वाले ने मेरे अनुकूल व्यवहार नहीं किया, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वह मेरा विरोधी है। इसका कारण और निवारण जानना आवश्यक है। जब हमें यह लगने लगे कि सामने वाले का मेरे प्रति व्यवहार अनुचित है, तब हम धैर्य और सत्यनिष्ठा से स्वयं को सामने वाले की परिस्थिति में रखकर घटनाक्रम का आकलन करें। सम्भवतः तब भी सामने वाले का व्यवहार पूर्णतः ठीक न लगे, किन्तु पहले जितना अनुचित भी नहीं लगेगा। हम अपनी दृष्टि से, अपने मापदण्ड से दूसरे को देखते हैं। जैसे ही हम दूसरे की दृष्टि और दूसरे के मानदण्ड से स्वयं को देखते हैं, भ्रान्ति मिटने लगती है। हम अपने को सही मानते हैं, सामने वाला अपने को सही मानता है, बात बिगड़ती चली जाती है। विचारधारा में अन्तर चलता रहता है। सब लोग एक जैसा नहीं सोच सकते। दोनों पक्षों की सोच अलग-अलग हो सकती है।
एक राजा अपने मन्त्री के साथ भ्रमण पर था। वन में राजा को भूख लगी। मन्त्री भोजन की खोज में गया। एक ऑंवले का पेड़ दिखा, मन्त्री पेड़ पर चढ़कर ऑंवले चखने लगा। थोड़ी देर में राजा भी पेड़ के पास पहुँच गया। ऊपर पेड़ पर बैठे मन्त्री को फल खाते देखकर राजा क्रुद्ध हो गया। मन्त्री नीचे उतरा और पके फलों की झोली राजा को खाने को दी। राजा ने नाराजगी व्यक्त की तो मन्त्री ने दूसरी झोली में जूठे और कच्चे ऑंवले दिखाकर बताया कि कच्चे फलों की पहचान करने को फल चखें, ताकि आपको मीठे-मीठे फल प्राप्त हों।
बिना सत्यता परखे हम हित करने वाले के विषय में भी अहितकर भ्रामक धारणा बना लेते हैं।
5. Ego must go - अहङ्कार को जरा सी चोट लगने पर व्यक्ति खिन्न हो जाता है। धैर्य खो देते हैं। सहन नहीं होता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने अहंता और ममता दोनों का बताया है।
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥2:71॥
ममता और अहङ्कार दोनों उद्वेग का कारण हैं।
6. अनाग्रही - हम अपनी राय दूसरे पर थोपने लगते हैं। उचित परामर्श देना तो ठीक है, किन्तु मेरा कथन या मेरा परामर्श ही उपयुक्त है। ऐसी बाध्यता करना अनुचित है। उचित परामर्श देने तक ही सीमित रहना है। परामर्श के गुण-दोष विचार कर कोई उसका अनुसरण करना चाहे तो भी ठीक, न करना चाहे तो भी ठीक।
7. I am always right - अपनी गलती के लिए हम वकील बन जाते हैं। दूसरे की गलती के लिए न्यायाधीश बन जाते हैं। हम स्वयं को सर्वोपरि उचित मानकर कहते हैं - मैं सही बता रहा हूँ। जो कह रहा हूँ मानते नहीं, इन्हें पता नहीं है। होना यह चाहिए कि हम दूसरे के लिए वकील बनें और स्वयं के लिए न्यायाधीश बनें। हम दूसरों को स्वयं से कम समझते हैं -
दुनिया में डेढ़ बुद्धि है। एक मेरे पास है, शेष सारी दुनिया के पास तो आधी मात्र है।
सभी झगड़ों का मात्र एक ही रास्ता है I am always right का भाव छोड़ दिया जाए।
मैं भी सही हूँ, वह भी सही है। कभी उसकी बात मानी जाएगी, कभी मेरी।
दो ही तरीके हैं वफ़ा के, आजमा के देख लो
या तो बन जाओ किसी के, या किसी को अपना बना लो
8. विवेक - किसी ने कुछ कहा, वह कितना महत्त्वपूर्ण है? या बिल्कुल महत्त्वपूर्ण नहीं है? इसके लिए भगवान ने हम सबको विवेक दिया है। बच्चा कहे कि मेरी माता कुछ भी कहती रहे, मैं उसकी परवाह नहीं करता। ऐसा करने से बच्चे का भविष्य नष्ट हो जाएगा। बच्चे को अपनी माता की बात गम्भीरता से माननी चाहिए।
9. अनधिकार हस्तक्षेप - हम अपने घर परिवार या समाज में जहाँ आवश्यक नहीं होता वहां भी हस्तक्षेप करने लगते हैं। जहाँ आवश्यक हो वहीं हस्तक्षेप करें।
हम अपनी राय या सुझाव शालीनता से रखें। हम दूसरे विभाग में या दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करें। अनपेक्षित हस्तक्षेप से दूसरे की सहनशीलता की भी हानि होती है।
10. अपैशुनम् - सोलहवें अध्याय में श्रीभगवान ने कहा हे अर्जुन! अपैशुनम् दैवीय गुण है। अपैशुनम् अर्थात निन्दा न करना। अपनी आलोचना किसी को अच्छी नहीं लगती। प्रशंसा के लिए हम प्रमाण ढूंढते हैं। क्या वास्तव में उसने मेरी प्रशंसा की है? निन्दा कहने मात्र से हम मान लेते हैं और तत्काल ही अपने मन में उसके प्रति वैमनस्य बना लेते हैं इसलिए हम किसी की निन्दा न करें। सत्य बात पता है तो भी क्यों कहना है?
11. Zero tolerance - वर्तमान में यह अत्यधिक प्रचलित शब्द है। जब हम सहनशीलता की बात करते हैं, तो सहनशीलता शून्य नहीं हो सकती।
कोई कहता है - सुनता तो मैं अपने बाप की भी नहीं।
उसे कान पकड़कर समझाना चाहिए - सुना करो।
किसी संस्था में स्त्री से दुर्व्यवहार सहन नहीं करेंगे। एक बार भी क्षमा नहीं करेंगे, नौकरी से निकाल देंगे। Zero tolerance
गीताप्रेस कहती है हमारी पुस्तक में एक भी त्रुटि सहन नहीं करेंगे। Zero tolerance
गीता परिवार कहता है कोई भी हमारे यहॉं धन की बात करेगा, सहन नहीं करेंगे। Zero tolerance
व्यक्तिगत जीवन में सहनशीलता ही चाहिए, न कि शून्य सहनशीलता। भगवान ने अर्जुन से कहा मान-अपमान, सुख-दुःख, शीत-ऊष्ण सहन करो।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्याः तांस्तितिक्षस्व भारत॥2:14॥
हरि शरणम्! हरि शरणम्! हरि शरणम्!
हरि शरणम्! हरि शरणम्!

॥ ॐ कृष्णार्पणमस्तु ॥




