मीठी बात (आशू भैया के साथ...)
मीठी बात
आशू भैया के साथ...
नववर्ष के प्रथम पर्व मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आदरणीय आशू भैयाजी के साथ एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ बाल सखा विराट चौहान भैया द्वारा मधुर वाणी में प्रार्थना से किया गया। विराट चौहान भैया मुंबई (महाराष्ट्र) से है और अप्रैल 2023 से गीता परिवार से जुड़े हैं। आरंभ में आदरणीय आशू भैया ने 3 मार्च से आरंभ होने वाले लेवल -1 के नए सत्र के बारे में जानकारी दी। और नये सत्र का प्रचार करने का अनुरोध किया। इसके पश्चात् 4-11 फरवरी तक आलंदी (पुणे) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम अमृत महोत्सव के विषय मे जानकारी दी।
आदरणीय भैया ने इस शुभ अवसर पर शास्त्र ज्ञान की चर्चा करते हुए शास्त्र सम्मत जीवन पर बल दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय परम्परा में छह शास्त्र हैं। (1) श्रुति (2) स्मृति (3) इतिहास (4) पुराण (5) आगम (6) दर्शन।
(1) श्रुति - जो सुनकर याद हो जाएं उसे श्रुति कहते हैं। श्रुति के अंतर्गत चार वेद, चार उपवेद और वेदान्त आते हैं।
(2) स्मृति - हमारे ऋषियों ने चार स्मृतियां बतलाई हैं, जिनमें मनुस्मृति सबसे प्राचीन हैं। और यही विश्व का सबसे प्रथम संविधान है।
(3) इतिहास - इतिहास में हमारे दो ग्रंथ आते हैं। महाभारत व वाल्मीकि रामायण।
(4) पुराण - हमारे अठारह पुराण हैं। अठारह महापुराण हैं और अठारह ही उपपुराण है।
(5) आगम - आगम अर्थात् उपासना पद्धति। इसके तीन प्रकार हैं। (1) वैष्णव आगम (2) शैव आगम एवं (3) शाक्त आगम।
(6) दर्शन - हिंदू धर्म के अनुसार छः प्राचीन दर्शन हैं। (1) न्याय (2) वैशेषिक (3) सांख्य (4) योग (5) मीमांसा (6) वेदान्त।
परन्तु इन शास्त्रों के अनुसार जीवन जीने का अधिकार उन्हें है जिनमें साधन चतुष्टय हैं अर्थात् शास्त्र सम्मत जीवन जीने के लिए निम्न गुण होने अनिवार्य है।
(1) विवेक (2) वैराग्य (3) षट्सम्पति (4) मुमुक्षत्व
1. विवेक - से ही मनुष्य को सही दिशा का ज्ञान होता है। विवेक और बुद्धि में अंतर होता है। बुद्धि हमें रास्ता दिखाती है लेकिन सही दिशा का ज्ञान विवेक के द्वारा ही प्राप्त होता है। विवेक की जागृति से जीवन उत्कृष्ट होता है। जीवन की सार्थकता विवेक से है।
होई विवेक मोह भ्रम भागा।
तब रघुनाथ चरण अनुरागा॥
विवेक मनुष्य को सत्संग से प्राप्त होता है गीता परिवार के माध्यम से कक्षाओं में सत्संग का लाभ पाकर साधक विवेक जागृति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं।
2. वैराग्य - आसक्ति का त्याग। सेवा कार्य करने के लिए त्याग आवश्यक है। विवेक की वृद्धि के लिए वैराग्य आवश्यक है। सेवा ही साधना है और सेवा के लिए षट्सम्पति का होना अनिवार्य है।
3) षट्सम्पत्ति - (1) शम (2) दम (3) उपरति (4) तितिक्षा (5) समाधान (6) श्रद्धा
- शम - शम का तात्पर्य है मन का निग्रह। मन के निग्रह से इन्द्रियों को वश में किया जा सकता है। मन चंचल है, निग्रह कठिन है, परन्तु भगवान गीता में कहते हैं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥6.34॥
अभ्यास से मन को वश में किया जा सकता है। और जो मनुष्य सांसारिक तृष्णाओं में नहीं फंसते वहीं सेवा के कार्य में अग्रसर होते हैं।
- दम - बाह्य इन्द्रियों का निग्रह। इन्द्रियों को विषयों से हटा लेना दम है। ईश्वर प्राप्ति तभी संभव है जब मन और इंद्रियों पर नियंत्रण हो।
भगवान कहते हैं:-
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2.61॥
अर्थात् जिसकी इन्द्रियां वश में हैं उसी की बुद्धि प्रतीष्ठित है।
- उपरति - इन्द्रियों को विषयों से हटाकर सब कामनाओं से रहित हो जाना उपरति है। संसार में अनासक्त भाव से रहना ही उपरति है।
- तितिक्षा - अर्थात् सम रहना।
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:।
शीतोष्ण सुख दु:खेषु सम: संग विवर्जित:॥12.18॥
पूज्य गुरुदेव जी कहते हैं मैं उन रामजी की वंदना करता हूं जिनके मुख पर राज्याभिषेक के समय कोई प्रसन्नता नहीं है और बनवास के समय उनके मुख पर कोई मलिनता नहीं है।
जिसने सुख-दु:ख में सम रहना सीख लिया वह मनुष्य भगवान को अत्यंत प्रिय है।
- समाधान - जब तितिक्षा आती है तो मन एकाग्र चित्त होता है। चित्त की एकाग्रता का नाम ही समाधान है। परमेश्वर में अपने चित्त को स्थापित करने का अभ्यास ही समाधान है।
- श्रद्धा - श्रद्धा तभी आती है जब ऊपर की पांच सम्पत्तियॉं आती है। श्रद्धा तर्क रहित होती है। जब मन में कोई प्रश्न नहीं होता। मेरे प्रभु को क्या अच्छा लगता है, इसके आगे कोई विचार नहीं है। गुरुपदिष्ट वेदान्त वाक्येषु विश्वास: श्रद्धा
शंकराचार्य जी कहते हैं षट्सम्पत्ति के बिना मोक्ष सम्भव नहीं है। आदरणीय आशू भैया ने बताया कि जितना हम गीता जी को जीवन में अपनाएंगे हम उतना ही समाधान प्राप्त करेंगे। आदरणीय भैया जी ने सभी गीता सेवी साधकों को भगवान का प्रिय बनने की प्रार्थना की और कहा कि हमें भगवान से भौतिक सुख की बजाय षट्सम्पत्ति मांगनी चाहिए।
इसके पश्चात् आदरणीय भैया ने सभी गीता सेवी साधकों की शंका का समाधान किया।
प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने बताया कि :-
सनातन धर्म शाश्वत है जिसका न आदि है न अंत है। सेवा तभी सार्थक है जब सेवा कार्य में सात्विक भाव हो, राजस भाव नहीं।
मनुष्य अपने कर्मों से ब्राह्मण बनते हैं। मानव के साथ कई जन्मों के संस्कार चलते है। हम जैसे कर्म करते हैं वैसे ही कुल में उत्पन्न होते हैं। संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए। समय परिवर्तनशील है। प्रकृति का नियम है कि अच्छा यदि सदैव नहीं रहता तो बुरा भी सदैव नहीं रहता। प्रकृति सबको मुस्कराने का अवसर देती हैं। इसलिए सदैव मुस्कराते रहें। भगवान कृष्ण ने जन्म लेने के साथ ही संघर्षों को सहन किया परंतु सदैव मुस्कराते रहें। वे अहंता - ममता से बंधे नहीं। साधना से ही अंहता/ममता छूट सकती है। अपना दृष्टिकोण बदल कर ही हम कष्ट दूर कर सकते हैं। जीवन में समन्वय स्थापित करें। प्रयास करें कि भगवत् सेवा कभी छूटे नही।
मोक्ष का अर्थ है पुनर्जन्म न हो। न कि शरीर का छूटना मोक्ष है।


